इंदौर में 30 करोड़ का इंटेलिजेंट सिग्नलिंग सिस्टम फेल: ट्रैफिक मैनेजमेंट नहीं सुधरा, अब होगा रीडिजाइन

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इंदौर। देश के सबसे स्वच्छ और स्मार्ट शहरों में शुमार इंदौर में ट्रैफिक व्यवस्था को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से लगाया गया करीब 30 करोड़ रुपये का इंटेलिजेंट ट्रैफिक सिग्नलिंग सिस्टम अपेक्षित परिणाम देने में विफल रहा है। स्थिति यह है कि जिस सिस्टम से जाम कम होने और यातायात सुचारू होने की उम्मीद थी, उसी के चलते कई प्रमुख चौराहों पर अव्यवस्था और बढ़ गई। अब प्रशासन ने इस पूरे सिस्टम को रीडिजाइन करने का निर्णय लिया है।


परियोजना का उद्देश्य और दायरा

स्मार्ट सिटी मिशन के तहत शुरू किए गए इस इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (आईटीएमएस) का उद्देश्य शहर के ट्रैफिक को डेटा आधारित बनाना था। इसके तहत प्रमुख चौराहों पर आधुनिक कैमरे, सेंसर और सॉफ्टवेयर लगाए गए, जो रियल-टाइम में वाहनों की संख्या का विश्लेषण कर सिग्नल टाइमिंग को स्वतः नियंत्रित करते।

इस परियोजना से अपेक्षा थी कि—

  • ट्रैफिक जाम में कमी आएगी
  • सिग्नल का समय वाहनों की संख्या के अनुसार बदलेगा
  • आपातकालीन वाहनों को प्राथमिकता मिलेगी
  • ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कम होगा

जमीनी हकीकत: सिस्टम से बढ़ी परेशानी

परियोजना के लागू होने के बाद शुरुआती दिनों में ही इसके कामकाज पर सवाल उठने लगे। शहर के कई प्रमुख चौराहों पर—

  • सिग्नल टाइमिंग असंतुलित रही
  • अनावश्यक लंबा रेड सिग्नल देखने को मिला
  • कम ट्रैफिक के बावजूद वाहन लंबे समय तक रुके रहे
  • पीक आवर्स में जाम की स्थिति और गंभीर हो गई

स्थानीय नागरिकों और वाहन चालकों का कहना है कि पहले जहां ट्रैफिक सामान्य रूप से चलता था, वहां अब बार-बार रुकावट आ रही है।


तकनीकी खामियां बनीं बड़ी वजह

विशेषज्ञों के अनुसार सिस्टम की विफलता के पीछे कई तकनीकी कारण सामने आए हैं।

1. सेंसर और कैमरों की सीमाएं

इंदौर की मिश्रित ट्रैफिक व्यवस्था—जिसमें दोपहिया, ऑटो, कार और बसें एक साथ चलती हैं—के चलते सेंसर सही आंकड़े जुटाने में असफल रहे। कई स्थानों पर कैमरों का एंगल भी उपयुक्त नहीं था, जिससे वाहन गिनती में त्रुटियां आईं।

2. लेन अनुशासन की कमी

सिस्टम इस धारणा पर आधारित था कि वाहन निर्धारित लेन में चलेंगे, लेकिन जमीनी स्तर पर लेन अनुशासन का अभाव है। इससे डेटा की सटीकता प्रभावित हुई।

3. सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन में समस्या

रियल-टाइम डेटा प्रोसेसिंग में देरी और एल्गोरिद्म की सीमाओं के कारण सिग्नल समय सही तरीके से समायोजित नहीं हो पाया।


मेंटेनेंस और मॉनिटरिंग की कमी

तकनीकी खामियों के साथ-साथ रखरखाव की कमी भी एक बड़ी वजह रही।

  • कई कैमरे और सेंसर समय पर ठीक नहीं किए गए
  • सॉफ्टवेयर अपडेट में देरी हुई
  • कंट्रोल रूम में प्रशिक्षित स्टाफ की कमी रही

इसके कारण सिस्टम की कार्यक्षमता लगातार गिरती गई।


प्रशासन की कार्रवाई

मामले की गंभीरता को देखते हुए नगर निगम और ट्रैफिक पुलिस ने संयुक्त रूप से समीक्षा की। अधिकारियों के अनुसार—

  • पूरे सिस्टम का तकनीकी ऑडिट कराया जाएगा
  • विशेषज्ञ एजेंसियों से रिपोर्ट ली जाएगी
  • जहां-जहां खामियां हैं, वहां सुधार किया जाएगा

सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह लिया गया है कि सिस्टम का रीडिजाइन किया जाएगा, ताकि यह शहर की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप काम कर सके।


रीडिजाइन में क्या होंगे बदलाव

प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक नए डिजाइन में निम्न बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा—

  • हाइब्रिड कंट्रोल सिस्टम: पूरी तरह ऑटोमैटिक के बजाय मैनुअल हस्तक्षेप की सुविधा
  • एडवांस एआई तकनीक: अधिक सटीक ट्रैफिक विश्लेषण के लिए
  • बेहतर सेंसर और कैमरे: उच्च गुणवत्ता वाले उपकरण
  • लोकल ट्रैफिक पैटर्न का अध्ययन: शहर के अनुसार सिग्नल टाइमिंग

नागरिकों की भूमिका भी अहम

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तकनीक से समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए नागरिकों को भी ट्रैफिक नियमों का पालन करना होगा—

  • लेन अनुशासन अपनाना
  • सिग्नल का पालन करना
  • अनावश्यक ओवरटेकिंग से बचना

अन्य शहरों से तुलना

देश के अन्य महानगरों जैसे Bengaluru और Mumbai में इंटेलिजेंट ट्रैफिक सिस्टम अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से काम कर रहे हैं। वहां की सफलता का मुख्य कारण स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सिस्टम का अनुकूलन और नियमित मॉनिटरिंग है।


आर्थिक पहलू: बढ़ेगा खर्च

30 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस सिस्टम के असफल होने के बाद अब इसके रीडिजाइन और सुधार पर अतिरिक्त खर्च आने की संभावना है। यह सीधे तौर पर सरकारी संसाधनों और करदाताओं पर अतिरिक्त बोझ डालेगा।

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