
देश के कई राज्यों में इन दिनों रबी सीजन की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया—गेहूं खरीदी—अपने चरम पर है। सुबह से लेकर देर शाम तक मंडियां किसानों की आवाजाही से गुलजार हैं। ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरा सुनहरा अनाज, सरकारी खरीदी केंद्रों की लंबी कतारें, तौल और भुगतान की उम्मीद में बैठे किसान—यह सब मिलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धड़कन को दर्शाते हैं। लेकिन इसी भीड़भाड़ और मेहनत के बीच एक ऐसी व्यवस्था खामोश हो गई है, जो वर्षों से किसानों को राहत देती आई थी—मंडी कैंटीन की सस्ती थाली।
कई मंडियों में जहां पहले किसानों को मात्र 5 रुपये में भरपेट भोजन मिल जाता था, अब वहां ताले लटके हुए हैं। वजह है रसोई गैस की लगातार बढ़ती कीमतें, जिसके कारण कैंटीन संचालकों के लिए सस्ती थाली उपलब्ध कराना असंभव हो गया है। यह स्थिति किसानों के लिए न केवल असुविधाजनक है, बल्कि उनके दैनिक खर्च में भी बढ़ोतरी कर रही है।
मंडियों की रौनक, लेकिन सुविधाओं का अभाव
गेहूं खरीदी के मौसम में मंडियों में किसानों की भारी भीड़ होती है। कई किसान दूर-दराज के गांवों से अपनी उपज लेकर आते हैं और उन्हें मंडी में कई-कई घंटे, कभी-कभी पूरे दिन रुकना पड़ता है। ऐसे में सस्ती कैंटीन उनके लिए एक बड़ी राहत होती थी।
पहले मंडियों में संचालित कैंटीनों में 5 रुपये में दाल-चावल या रोटी-सब्जी की थाली मिल जाती थी। यह योजना खास तौर पर छोटे और सीमांत किसानों को ध्यान में रखकर शुरू की गई थी, ताकि वे बिना ज्यादा खर्च किए भोजन कर सकें। लेकिन अब हालात बदल गए हैं।
गैस सिलेंडर की कीमतों ने बिगाड़ा गणित
कैंटीन संचालकों का कहना है कि पहले जहां एक घरेलू गैस सिलेंडर 400-500 रुपये में मिल जाता था, वहीं अब इसकी कीमत 1000 रुपये के आसपास पहुंच गई है। व्यावसायिक गैस सिलेंडर तो इससे भी महंगा हो चुका है।
कैंटीन संचालक बताते हैं कि सिर्फ गैस ही नहीं, बल्कि खाद्य सामग्री जैसे दाल, सब्जी, तेल और मसालों की कीमतों में भी भारी वृद्धि हुई है। ऐसे में 5 रुपये में थाली देना घाटे का सौदा बन गया है।
एक कैंटीन संचालक ने बताया, “हम पहले रोजाना सैकड़ों किसानों को सस्ती थाली देते थे। लेकिन अब खर्च इतना बढ़ गया है कि अगर हम उसी दर पर खाना दें, तो हमें हर दिन हजारों रुपये का नुकसान होगा। इसलिए मजबूरी में कैंटीन बंद करनी पड़ी।”

किसानों की बढ़ी परेशानी
कैंटीन बंद होने का सीधा असर किसानों पर पड़ा है। अब उन्हें मंडी के बाहर महंगे होटलों या ढाबों पर खाना खाना पड़ रहा है, जहां एक थाली की कीमत 50 से 100 रुपये तक है।
छोटे किसानों के लिए यह अतिरिक्त खर्च भारी पड़ रहा है। एक किसान ने कहा, “हम सुबह जल्दी घर से निकलते हैं और कई बार शाम तक मंडी में ही रहना पड़ता है। पहले 5 रुपये में खाना मिल जाता था, अब 80-100 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे हमारी आमदनी पर असर पड़ता है।”
सामाजिक योजना का ठप होना
यह सस्ती थाली योजना सिर्फ एक सुविधा नहीं थी, बल्कि एक सामाजिक पहल भी थी। इसका उद्देश्य था कि किसान, मजदूर और अन्य जरूरतमंद लोग कम कीमत में पौष्टिक भोजन प्राप्त कर सकें।
कई जगहों पर यह योजना सरकारी सहयोग या सहकारी समितियों के माध्यम से चलाई जाती थी। लेकिन लागत बढ़ने के बावजूद सब्सिडी या वित्तीय सहायता में वृद्धि नहीं होने के कारण यह योजना धीरे-धीरे ठप होती जा रही है।

प्रशासन की चुप्पी
मंडी कैंटीनों के बंद होने पर स्थानीय प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। किसान संगठनों का कहना है कि यदि सरकार चाहे तो इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।
वे मांग कर रहे हैं कि या तो गैस सिलेंडर पर सब्सिडी दी जाए या फिर कैंटीन संचालकों को अतिरिक्त आर्थिक सहायता प्रदान की जाए, ताकि सस्ती थाली योजना को फिर से शुरू किया जा सके।
स्वास्थ्य और पोषण पर असर
कैंटीन बंद होने से किसानों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है। लंबे समय तक मंडी में रहने के दौरान यदि उन्हें संतुलित भोजन नहीं मिलता, तो यह उनकी कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है।
सस्ती थाली में आमतौर पर दाल, चावल, सब्जी और रोटी शामिल होती थी, जो पोषण के लिहाज से संतुलित आहार प्रदान करती थी। लेकिन अब किसान अक्सर बाहर के तले-भुने या कम गुणवत्ता वाले भोजन पर निर्भर हो रहे हैं।

वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत
स्थिति को देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि सरकार और प्रशासन मिलकर कोई वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करें। कुछ संभावित उपाय इस प्रकार हो सकते हैं:
- कैंटीन संचालकों को गैस और खाद्य सामग्री पर सब्सिडी देना
- मंडियों में मोबाइल फूड वैन शुरू करना
- स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से सस्ती भोजन योजना चलाना
- CSR (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के तहत निजी कंपनियों की भागीदारी सुनिश्चित करना

किसानों की आवाज
किसानों का कहना है कि सरकार उनकी उपज तो खरीद रही है, लेकिन उनकी बुनियादी जरूरतों की अनदेखी की जा रही है। मंडियों में पेयजल, शौचालय और भोजन जैसी सुविधाएं उतनी ही जरूरी हैं जितनी खरीदी की प्रक्रिया।
एक किसान नेता ने कहा, “अगर किसान पूरे दिन भूखा-प्यासा रहेगा, तो वह कैसे काम करेगा? सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।”



